सुना था दर्पण झूठ न बोले,
सच को हरदम बाहर निकाले।
रोज सामने दर्पण रहता,
बाहर से खुद को हरदम देखा।
आज अलग दर्पण में पाया,
अंतररूप चेहरे पे जो आया।
दर्पण था जो सच पढ़ पाया,
छिपा दर्द था बाहर लाया।
जिंदादिली मुस्कान तो जैसे,
नदारद थे जीवन से जैसे।
अस्तित्व अपना सब विलीन हुआ था,
अंदर अपने क्यों न झाँका अब तक था।
दर्पण ही था सच्चा साथी,
सच क्या है सब दिखा रहा था।
खोया अस्तित्व वापस लाना है,
सोया अंतर्मन जगा रहा था।
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