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चेहरा

                
                                                         
                            यूँ तो हर रोज दर्पण में अपना अक्स निहारा करते हैं।
                                                                 
                            
कुछ भय और माथे पर सिलवटें ही तो देखा करते हैं।।

पर आज दर्पण में जब खुद को निहारा।
तो अपना ही अक्स कुछ अलग नजर आया।।

बीते बरस की धूसरित यादों से मुरझाया चेहरा।
कुछ अनजाना-सा खिलता, मुस्कुराता नजर आया।।

शायद यह नए वर्ष के आगमन की खुशी होगी।
या आने वाला साल अच्छा हो, यह उम्मीद होगी।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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