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बेवफ़ाई

                
                                                         
                            ठिठुरती ठंड में भी,वो पसीने से तरबतर थी,
                                                                 
                            
बेवफाई की लौ, जो उसके सीने में धधक रही थी।

बेवफा कोई और था, पर जल वो रही थी,
बेवफा तक तो, उस लौ की लपट तक नहीं थी।

आँसू भी उस लौ में, जैसे घी बन रहे थे,
लौ की धधक को और भड़का रहे थे।

जो न समझ थे, वह कुछ न समझ रहे थे,
इस दौर से गुजरे, वो यह दर्द समझ रहे थे।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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