ठिठुरती ठंड में भी,वो पसीने से तरबतर थी,
बेवफाई की लौ, जो उसके सीने में धधक रही थी।
बेवफा कोई और था, पर जल वो रही थी,
बेवफा तक तो, उस लौ की लपट तक नहीं थी।
आँसू भी उस लौ में, जैसे घी बन रहे थे,
लौ की धधक को और भड़का रहे थे।
जो न समझ थे, वह कुछ न समझ रहे थे,
इस दौर से गुजरे, वो यह दर्द समझ रहे थे।
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