आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मानता हूँ

Manta hu
                
                                                         
                            यादों की गुल्लक में हर रोज सिक्के डालता हूँ ,
                                                                 
                            
ये मानता हूँ,
जब आएगा बुढ़ापा गुजारा इन्ही से होगा
पैसे कम कमाता हूँ, दोस्त ज्यादा बनाता हूँ ,
ये मानता हूँ ,
जब आएगी मुसीबत सहारा इन्हीं से होगा
सब कहते हैं बेअसूल हूँ, खोटा हूँ, फिजूल हूँ, फूल नही शूल हूँ
महफिलो का शौक नहीं मुझे, तन्हाई में जीना जानता हूँ,
ये मानता हूँ,
जब हो जाऊंगा बेकार इशारा इन्ही से होगा।

 

 
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर