नहीं चाहिए तुम्हें मुरझाए फूलों की माला
तुम जीवित कांटों पर चलकर खुश रहो
नहीं बना है तुम्हें जीवित मुर्दा
तुम खंजीत लहूलुहान खुश रहो
नहीं बना है तुम्हें किसी के विचारों की मूक मूर्ति
तुम कर्कश ही सही
पर अपनी आवाज में खुश रहो
लहजे, लफ्जों, मर्यादा, सभ्यता ,संस्कार
सब में तुम अद्वितीय हो
बस स्वतंत्र देश में
तुम अपने से ज्यादा दूसरों की परतंत्र हो
अगर ढूंढ लो अपने अंतर मन को
तो तुम सब पर भारी हो
आखिरकार तुम आज की नारी हो
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