लोगों के डर में ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।
लोगों का अपराधी ये समाज ,
समाज का अपराधी ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।
लोगों के जहन में बैठा ये डर ,शक्ल सूरत अपना श्रृंगार में बैठे ये लोग ,लोग क्या बोलेंगें ।
शोषित हो रही है बहुत सी जीवित आत्माएं ,
मन अपना तन अपना पोशाक अपना पसंद करने वाले ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।
कितने अरमान दब गए डर के साये में ,
कितनी इच्छाएं दब गई उम्र की लिबास में ,
कभी इच्छा की चाहत जगी तो खौफ है मन में लोग क्या बोलेंगें ।
कितनी इच्छा मर गई शदियों में , कितनी इच्छा जन्म ले रही है समाज की चौराहों में ,
बिगड़े बोल की अकड़ती दुनिया ,
नन्हीं नन्हीं इच्छाओं पर तंज कसती दुनिया ,
लोगो के डर साये में जीते ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।
इच्छाएं भी है खौफ में ,
उम्र की लिबास की रोक में,
तंज कसने वाले है ये लोग ,
आधे-अधूरे दिन बिसरे उम्र की लिबास में
चमचमाती दुनिया देख लालच की लार टपकी तो मन मेरा है खौफ में ,लोग क्या बोलेंगें ।
लोगों का डर इतना , समाज का खौफ इतना ,
सपने में जीते है आधे - अधुरे लोग ,
इच्छाओं की महफिल अंधेरे में सजाते है ये लोग ,
लोगों के अपराधी ये है लोग , लोग क्या बोलेंगें । ॥
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