आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

लोगों के डर में लोग , लोग क्या बोलेंगें ।

                
                                                         
                            लोगों के डर में ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।
                                                                 
                            
लोगों का अपराधी ये समाज ,
समाज का अपराधी ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।

लोगों के जहन में बैठा ये डर ,शक्ल सूरत अपना श्रृंगार में बैठे ये लोग ,लोग क्या बोलेंगें ।

शोषित हो रही है बहुत सी जीवित आत्माएं ,
मन अपना तन अपना पोशाक अपना पसंद करने वाले ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।

कितने अरमान दब गए डर के साये में ,
कितनी इच्छाएं दब गई उम्र की लिबास में ,
कभी इच्छा की चाहत जगी तो खौफ है मन में लोग क्या बोलेंगें ।

कितनी इच्छा मर गई शदियों में , कितनी इच्छा जन्म ले रही है समाज की चौराहों में ,
बिगड़े बोल की अकड़ती दुनिया ,
नन्हीं नन्हीं इच्छाओं पर तंज कसती दुनिया ,
लोगो के डर साये में जीते ये लोग , लोग क्या बोलेंगें ।

इच्छाएं भी है खौफ में ,
उम्र की लिबास की रोक में,
तंज कसने वाले है ये लोग ,
आधे-अधूरे दिन बिसरे उम्र की लिबास में
चमचमाती दुनिया देख लालच की लार टपकी तो मन मेरा है खौफ में ,लोग क्या बोलेंगें ।

लोगों का डर इतना , समाज का खौफ इतना ,
सपने में जीते है आधे - अधुरे लोग ,
इच्छाओं की महफिल अंधेरे में सजाते है ये लोग ,
लोगों के अपराधी ये है लोग , लोग क्या बोलेंगें । ॥

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर