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किराए की गलियों में जिंदा परिंदा ...

                
                                                         
                            किराए की गलियों में जिंदा परिंदा
                                                                 
                            
बना लिया खुद का मकान
सोच रहा है सारा जग है मेरा मुट्ठी में
सब संचित धन मेरा
इस जग से ना लूंगा मैं मिटने का नाम
आया हूं मैं स्वर्ग धरा से अमर का पानी पीकर
मौत हरदम होगा नाकाम
समय करवटें बदलती गई
अचानक पैर से जमीन खिसक गई
किस्मत का लिखा टाल न सका
किराए की गलियों में जीवन मुकम्मल हो ना सका
संचित धन सब मिला धूल मिट्टी में
पांच तत्व से बनी काया भी
हुई पंचतत्व में विलीन
रह गया ये किराए की गलियां
ढह गया किराए की गलियों में बसाई मकान
उड़ गया आत्मा परिंदा
मिट्टी में मिल गया कंचन काया
सारी दुनिया बनी पड़ी छाया
सत्य है सृष्टि में जीवन मृत्यु
व्यर्थ है इस जग में मोह माया अंहकार
जन्म हुआ है तो मरण है निश्चित
कोई आगे तो कोई पीछे पर मौत है निश्चित
कर्म करो कुछ अच्छा
युगों-युगों याद करेगी सारी सृष्टि । ॥

( रेखा भारती - निर्मल ठाकुर )
( बनासो हजारीबाग झारखंड)

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4 वर्ष पहले

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