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कर्ज़ का दर्द ।

                
                                                         
                            कर्ज़ का दर्द बड़ा बेदर्द ,
                                                                 
                            
बैचेनी में जिंदगी कटती नहीं ,
सुकून की नींद मिलती नहीं,
करवटें बदलती बदन ,
अंदर में कल्पती आत्मा ,
अंधेरे में दीवारों को झांकती अंखियां ,
पुतलियों में नरमिया आती नहीं ,
काटने को दौड़ता है ये जिंदगी ,
गले को जकड़ता है ये गरीबी ,
कर्ज़ के दल दल में फंसे पांव को सुखी जमीं मिलती नही ,
कर्ज़ का दर्द की दवा कोई मेडिकल में मिलती नहीं ।

नर्क से भी बदतर है कर्ज़ वाली जिंदगी ,
सारी ईच्छाओं को खा जाती है ,
खाली पेट को भी रोटियां तोड़ने समय हीं सजा देती है ,
चिंता से चीता में आग लगा देती है,
अंधेरे की आधी रात हो या प्रातः की शुभ बेला ,
कर्ज़ का पहरा से ये जीवन है अंधेरा हीं अंधेरा ,
बड़ा मुश्किल होता है कोई शौक पुरा करना ,
अमर बेल रूपी कर्ज़ से बड़ा मुश्किल होता है बाहर निकलना ।

शराब से भी ताकतवर ये कर्ज़ ,
ना जाने कितने शराब को कर्ज़ के जहर में मिला दिया,
कितने आनाड़ी को जुओं की खिलाड़ी बना दिया ,
कितने रईस को दिवालिया बना दिया ,
कितने मासूम बैचारे गरीब को मौत के घाट उतार दिया ,
शराब का क्या है भाई इसको जिसने पिया जिंदगी खुलकर जिया ,
आंत गई सौ बिमारियां आई तो क्या हुआ इसके लिए तो डॉक्टर बैठे भाई , मेडिकल में हजार दवाई ,
पर कर्ज़ की दर्द का कोई ना जाने पीर पराई ,
इसकी कोई मेडिकल में उपलब्ध नहीं है दवाई । ॥
-रेखा भारती

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