शहद से मीठी
सुरीली कुछ नमकीन
कुछ खट्टी
कुछ चटपटी कुछ तीखी हमारी हिंदी
कड़वी शब्दों में भी होती है मीठी मीठी नमी
मधुर वचन में ये है अमृतवाणी
कूट कूट कर भरा इसमें संस्कार
आचरण इसकी बड़ी निराली
अहंकार में भी छुपा रखी है संस्कार
भटके बिछड़े तो यूं गले लगती
अतिथि को करती अभिनंदन
स्वागत सत्कार में ना रहने देती कोई कसर
अपनी वर्णमाला को पहनाकर
शब्दों अर्थों से करती मोहित
रिश्ता रिश्तेदारों में इसकी बड़ा व्यवहार
छोटा बड़ा को करती कद्र
अपना पराया में होती दर्द
मोतियों जैसे शब्दों में बहती रसधार
इनकी अर्थों में खुलती है प्रेम की द्वार
विश्व की समस्त भाषाओं में से
एक निर्मल पवित्र सर्वोपरि हिंदी हमारी
संस्कृत है इसका उद्गम स्थल
व्याकरण है इसकी रीड की हड्डी
शब्दों अर्थों की सौंदर्य से चमक रही है हिंदी का चेहरा
सभी भाषाओं में से हसीन हिंदी हमारी
है भारत माता की बिंदी । ॥
(रेखा भारती -निर्मल ठाकुर )
(बनासो , हजारीबाग , झारखंड )
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