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"पिछड़ा-मानव"

                
                                                         
                            जिन संस्कारों को मैंने सीखा,
                                                                 
                            
जीवन के विमल वितानों में ।
धूल -धूसरित आज हो रहे,
नव -संस्कारों के आ जाने से ।
भूतकाल की संस्कृतिओं ने,
है आज मार्ग प्रसस्त किया ।
समय आज परिवर्तनशील है,
जिसे सम्पूर्ण जगत ने है, स्वीकार किया ।
पर परिवर्तन को अन्तर्मन से,
मैं स्वीकार नहीं कर पाया ।
इसीलिए इस धरती पर मैं,
पिछड़ा मानव कहलाया ।

निर्मल कुमार गुप्ता, सीतापुर।
 
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4 वर्ष पहले

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