बंद खिड़की, खुला दरवाजा
मिला है मुझे बस एक किनारा,
ख्वाबों की गलियों में खोई हुई
मेरा सिर्फ मैं ही सहारा।
जिधर-जिधर नजरें जाती
बाहर की दुनिया है भाती,
चारों ओर छाई है बर्बरता
डरी रूह बाहर न आती।
न जाने ये अँधेरा कब छटेगा
उस पर नया सवेरा कब चढ़ेगा,
इस पल के इंतजार में बैठी
कभी तो मेरा भी ख्वाब सजेगा।
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