पढ़त-लिखत किशोरी, धीरे-धीरे जवान होय,
कली-सी कोमल सूरत उसकी, कमल-सी सुंदर होय।
अम्बर की छत तले, संग किसी के एक दिन होय,
जग के छल-प्रपंच देख, मन उसका व्याकुल होय।
लालच भरे ज़माने में, अचरज कैसा होय,
भोले के जोड़त हाथ, मन में प्रश्न अनेक होय।
एक से अनेक रात बीतें, नयनन में नींद न होय,
भोले! अब बतलाओ, मन चैन से कैसे सोय?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X