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कविता : अमीर और गरीब....

                
                                                         
                            कविता : अमीर और गरीब....
                                                                 
                            
ये कहना ठीक नहीं जो अमीर है
उसका सब ठीक होता है
अरे भाई भीतर ही भीतर
वो भी बहुत रोता है

ये भी ठीक नहीं कि हमेशा
गरीब ही मार खाता है
कभी न कभी तो भाई
उसका भी दिन आता है

पहले अमीर को
हम देखते हैं
उसके बारे में
कुछ लिखते हैं

अमीर के बारे में
ऐसा है
होते तो बहुत
पैसा है

मगर उनके बच्चे प्राय कर
प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं
जब तक पढ़ाई पूरी न हो स्कूल
में मोटी रकम भरते हैं

पढ़ाई करके भी होती
नहीं प्रगति खास
उनके रुपये पैसों का
होता सत्यानाश

न उनके बच्चे ढंग की
नौकरी पाते हैं
वे ऐस और आराम में ही
मस्त हो जाते हैं

पैसों का बहुत ही
दुरुपयोग करते
मां बाप को देखते नहीं सिर्फ
अपना पेट भरते

धनी भी आज ये हालत
से गुजर रहा
भीतर ही भीतर
बेचारा मर रहा

अब गरीब की बात
करने लगते हैं
वे न ढंग से सोते न ढंग
से खा सकते हैं

अपने बच्चों को स्कूल
में भेज भी नहीं पाते
वे उन्हें छोटी उम्र में ही
काम धंधा में लगाते

इस तरह उनके घर का
खर्चा भी चलता
अपने बच्चों को स्कूल पढ़ाके
उन्हें क्या मिलता ?

इस दृष्टि से देखा जाए तो
गरीब संतोष नजर आए
जो अमीर है बेचारा उसे तो
चिंता ही चिंता खाए.......

 
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3 घंटे पहले

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