तन पर ओढ़ रखा जो लिबास तुमने
किस के दीद की लगाई आस तुमने
गर ऐसे रुख मोड़ना ही था तो फिर
मोह्ब्बत की क्यूं लगाई आग तुमने
शान-ए-शोहरत अपना संभाले रखते
फ़कीरी पर क्यूं उड़ाया मजाक तुमने
बेख़बर हो खुदा की बनावट से तुम
गज़ब हुनर को भी ना बख्शा तुमने
बरसती रही फूलों की तरह जो हमेशा
उस अंदाज को बेअन्दाज़ किया तुमने
बेरुख़ी भी इतनी क्या तुम्हें थी मुझसे
मेरी भेजी सौग़ात भी रौंद दिया तुमने
गर किराए का मकान था दिल तुम्हारा
तो फिर मेरा सजदा ही क्यूं किया तुमने।
नेहा यादव
लखनऊ उत्तरप्रदेश
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