आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ऐतबार

                
                                                         
                            जो कहना चाहते हैं कभी तो समझा करो
                                                                 
                            
मेरी मोह्ब्बत पर कभी तो ऐतबार करो
ना समझ नही हो तुम ऐ दिल-ए-वफ़ा
चाहत का कारोबार बना के रखते हो तुम
खिलौने की तरह मुझको ना आज़माया करो
चाहत की परख इतनी ही रखते हो तुम
कभी तो अहसासों का कारवां बनाया करो
मुक़म्मल चाहतों का घरौंदा सजा रखा है
मेरी दहलीज़ पर कभी तो लौट के आया करो
यहां जश्न-ए-जिंदगी का हर पन्ना कोरा है
कभी तो मेरी नज़र से नज़र मिलाया करो।।


नेहा यादव
लखनऊ उत्तरप्रदेश


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर