मैं खींच कर गरीबी को गुज़ारे पर ले आता
समेट कर सारे आसमां को तारे पर ले आता
बस वक्त ने ही रुख बदल दिया हवाओं का
मैं डूब कर भी कश्ती किनारे पर ले आता
मेरा भाग्य ही मेरे सामने अड़ कर खड़ा है
यक़ीन मानो मैं जिंदगी को नज़ारे पर ले आता
मेरी पीठ में खंज़र मेरे अपनों का ही था
मैं हार कर भी जीत को दुआरे पर ले आता
-नीटू मावी
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