आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पहले से तय एजेंडा

                
                                                         
                            पानी की चाल देखकर खोल दिए सारे बराज।
                                                                 
                            
बस्तिया कलही बह गई ,मुनादी हो रही आज।
तनख्वाह में ही कैद है,ऐंकरो के झूठ का सच,
पहले तय एजेंडा,फिर अंतरात्मा की आवाज।
मुजरिम और मुंसिफ दोनो किताब की जिल्दे,
भीतरी पन्नों पर होता है संविधान का आगाज़।
गन्दी गन्दी गालीया सुनकर शब्दकोश निशब्द,
बदले बदले नजर आने लगे है,हया और लाज।
वोट की तलाश में नेताओं ने दो खजाने ढूंढे है,
पहला मंदिर का घंटा, दूसरा मस्जिद में नमाज़।
भाई चारा तो तुरंत हो जाए, बस शर्त है ईतनी,
वो तख़्त गिराएंगे सारे और उछालेंगे सब ताज।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर