पाताल मे गड़ा है आकाश देख रहा है।
सियासती गिद्ध अब लाश देख रहा है।
चमचें गोबर को गुड बनाने मे लग गये,
वो ख़ुद मे अब जयप्रकाश देख रहा है।
जोकर छांट दिया गड्डी से अलग हमने,
अब वो दांव छोड़कर ताश देख रहा है।
वो तो पतझर की पनौती बना हुआ है,
कौन उसमे बौराया पलाश देख रहा है।
गोया तुम्हे बांधकर जकड़ेगा वो ज़रूर,
तुम्हारे साइज़ का नागपाश देख रहा है
-जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X