डेंगू, मच्छर, मख्खी और तिलचट्टे।
लगता है आदमी नही बचे हट्टेकट्टे।
अब चुनाव आयोग भी खट्टा हुआ,
पहले हारने पर अंगूर होते थे खट्टे।
सब लगे हुये है संविधान बचाने मे,
ये सब एक ही थैली के है चट्टे-बट्टे।
लहराकर तिरंगा,फैला रहे हो दंगा,
हाथ मे है संविधान,ज़ेब मे है कट्टे।
वो नेता आन्दोलन छेड़कर ग़ायब,
बचे अंधभक्त है, या उल्लू के पट्ठे।
- जयंत दिक्षित
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