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मक्खी भी हथौड़े से कब टकराती है।

                
                                                         
                            हथौड़े से कभी मख्खी नहीं मारी जाती है।
                                                                 
                            
मगर मक्खी भी हथौड़े से कब टकराती है।
अफ़वाह तराशी से लहूलुहान है जम्हूरियत,
कज़्ज़ाब को मग़रिब से दौलत जो आती है।
मुनाफ़ा गिनती रहती है ये सिर्फ़ दिन रात,
ये मआशियात लाशें क्यों गिन नही पाती है।
काला धन ढूंढने सूरज बाँधकर वो निकला,
सियाह दौलत अब रोशनी से जगमगाती है।
गड्ढों मे ही सड़क ढूंढ लेते है ये मासूम लोग,
गड्ढे पुराने भरने फिर नई सरकार आती है।
-जयंत दिक्षित
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52 मिनट पहले

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