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भंग विनयों का विनय भंग होने लगा है,

                
                                                         
                            तुम्हारे इरादे नज़र आ रहे हैं मशकूक।
                                                                 
                            
संविधान लहरा रहे हो या कोई बंदूक।
धन बल,बाहु बल खुब है मगर नादीदा,
तु तो बस जंतर मंतर पर देर तक रुक।
भंग विनयों का विनय भंग होने लगा है,
मुहाफ़िज़ के चेहरे से टपकता मख़शूक़।
अंगुली पकड़वा ली तो वो गला पकड़ेंगे,
बड़ी भारी पड़ेगी तुमको सियासती चूक।
तुमको देर तक इस तख़्त पर कैसे सहू,
मै ही औरंगज़ेब,औरंग ही है मेरी माशूक।
-जयंत दिक्षित
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एक घंटा पहले

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