ये आंदोलन धरने नही, पुराने रक्तबीज है।
तुम्हारी समझ से परे भी तो कोई चीज़ है।
मसनद का कोई खौफ़ न था न है, न होगा,
इक़्तिदार उसको तरके मे मिली कनीज़ है।
मज्रूह होती रही किस कदर आबरू-ए-उसूल,
आवाम को बद-दियानती कितनी अज़ीज़ है।
मग्रिब-परस्त वतन को ही गालीयां दे आते है,
अब आतिश-आलूद मुल्क की ही दहलीज़ है।
शागिर्दों का यहां इक बड़ा जंगल बना दिया,
उस्ताद खुद ही बद-लिहाज़-ओ-बदतमीज़ है।
सूट-बूट के सपने दिखाकर लंगोट छीन ली,
नारा न लगाऊँगा ,मेरे पास एक ही कमीज़ है।
-जयंत दिक्षित
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