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"बंद घड़ी"

                
                                                         
                            मेरे पिता ने जो दी थी
                                                                 
                            
एक अदद हाथ घड़ी।
वो इन दिनों शेल्फ में,
है बेजान सी बंद पड़ी।

गुजरा वक्त नहीं होता
वर्तमान की धड़कन।
बूढ़े की लाठी न बनेगा,
उसका अपना बचपन।

सोचता था बस गया हु,
निज प्रदेश में अभिषिक्त।
बंद घड़ी बोली, तुम भी,
अब होने लगे निर्वासित।
- जयंत दिक्षित
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3 घंटे पहले

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