माँ का पावन आगमन
आयीं जगदम्बा द्वार, हषित संसार आज,
चमके कनक-कलश, दिव्य ज्योति छा गयी।
माँ के पावन चरण, नूपुर की छण-छण,
भक्तों के हिरदे में, आस नयी आ गयी।
विंध्याचल-वासिनी, सिंह पे असवार आज,
अंबर से बरसे हैं, अछत और पारिजात।
अंधियारा भागा सब, दीपक की बाती से,
आयी सुख-संपदा, महकी है भोर-रात।
शीश झुकाएँ सब, चरणों की छाँव तले,
पापों का नाश करे, माँ की ये करुणा-धार।
भक्ति-रस-भीगा मन, चंदन-सा महक उठा,
तारती भवानी मैया, भव से ये बारंबार।
मंदर-सा मन हुआ, आरत की लौ जली,
तामसी सब वृत्तियाँ, छन में बिला गयीं।
खप्पर और खड्ग धरे, मैया कल्याणी आज,
संकट सब हरने को, घर-घर में आ गयीं।
रोली और अक्षत का, माथे पे तिलक सोहे,
अनुप्रास-रूपक से, सजी काव्य-वंदना।
सूरज-सा चमके री, माँ का ये पावन रूप,
दूर हुई चित की, हर एक वेदना।
जय-जय भवानी माँ, शक्ति की अवतारी,
पूरन करो माँ मैया, सबकी मनोकामना।
सुख और समृद्धि का, बरसे अशेष दान,
शीश नवा करते हैं, मैया की अर्चना।
पावन नवरात्रि की, सबको शुभकामना!
-नीरज तँवर
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