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जीवन के तापमान और ढलते तेवर

                
                                                         
                            जीवन के तापमान और ढलते तेवर
                                                                 
                            
चूल्हे पर चढ़ा खौलता पानी,
सुनो रे लोगो कहता है कोई कहानी!
देखो तो जरा इस कुदरत का खेल,
जहाँ एक ही आंच में दो चीजें ढलीं—
अंडा अंदर से पत्थर जैसा हुआ,
और आलू का सीना पसीज कर गला!
तापमान की तपिश जब दोनों को मिली,
तो किसकी क्या थी असलियत, वह खुली।
अंडे का घमंड था सख्त खोल के भीतर,
आग लगते ही उसका अहंकार सिकुड़ा,
अंदर का तरल सब कुछ ठोस बन गया,
हर इक चुनौती ने उसे और अकड़ा दिया।
वहीँ दूसरा था वो सीधा साधा आलू,
जिसके भीतर थी मिट्टी की सीधी खुशबू।
बाहर से खुरदरा, पर दिल का था वो कोमल,
खौलता पानी जब उसकी खाल पर पड़ा,
उसने शिकन तक न लाई अपने मस्तक पर,
भीतर से पिघल कर वो एकदम नरम हो गया।
यही तो है जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई,
हर एक इन्सान की यहाँ होती है परख भाई!
मुसीबत की भट्ठी जब चारों तरफ सुलगती है,
तो दुनिया की तासीर यहाँ साफ झलकती है।
कोई संकट की आग में अकड़ कर टूट जाता है,
तो कोई सीख कर नरमी से सबको अपना बनाता है।
-नीरज तँवर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
54 मिनट पहले

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