आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक कवि

                
                                                         
                            मैं कवि नित कोरे कागज पर,
                                                                 
                            
संसार रचता हूं
विशाल जगत संपूर्ण माया को
सूक्ष्म कर देता हूं।
कर तन मन धन को,
कल्पना के हवाले,
यू स्वतंत्र गगन की सैर करता हूं।।
है किया स्पर्श ममता को जिसने,
मैं वही कलमदार हूं,
पहुंच ना सका जहां रवि
मेरा वही ठिकाना है,
मैं घोर समर के मैदानों में,
संगीत सुर ताल रचता हूं।।
रचता हूं सीमित कागज पर,
असीमित प्लावित जग की माया,
रेगिस्तान की धूप में वृक्षों की,
शीतल छाया
मैं गृहस्थ जीवन में सन्यास रचता हूं।।
रंगता है श्वेत बेरस कागज को
सुख जीवन के रागों से
मैं वही रंगरेज हूं ।
है दर्शन शक्ति असीमित,
जिसकी कल्पना भी,
असीमित,
मैं वह कवि हुं।।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
52 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर