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प्लास्टिक के अंबार पर खड़े हम

                
                                                         
                            प्लास्टिक के अंबार पर खड़े हम
                                                                 
                            

अनुमान है विशेषज्ञों का,
जिस रफ्तार से कर रही है दुनिया
प्लास्टिक इस्तेमाल।
2020 तक 12 अरब टन प्लास्टिक का
कचरा हो जाएगा जमा,
साफ करने में लगेंगे सैकड़ों साल।
प्लास्टिक के पहले दुनिया में था
कपास, शीशा, जूट और रबर।
चीजों को रखने और ले जाने में
ली जाती थी खाल और सींगों की मदद।
इनसे बक्से, पियानो, बिलियर्ड्स बॉल
और दूसरी चीजें बनती थीं।
पर माँग के मुकाबले सप्लाई बहुत कम थी।
अठारह सौ साठ के दशक में
बिलियर्ड बॉल बनाने वाली एक कंपनी ने
किया ऐलान।
कोई हाथी के दाँत का विकल्प करे ईजाद,
तो देगी एक अरब डॉलर का इनाम।
अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन वेसली हयात ने बनाया
एक केमिकल सेल्यूलाइड नाम का।
पौधों में था पाया जाता,
पर विकल्प अच्छा नहीं था।
ठीक उसी दौर में बेकेलाइट का हुआ ईजाद
प्रयोगशाला में बना, पूरी तरह सिंथेटिक था।
साथ में हो गई प्लास्टिक युग की शुरुआत।
बीसवीं सदी के तीस के दशक तक
प्लास्टिक ने लिए पैर पसार।

पंचतत्व.. जल, हवा, आसमान, आग और मिट्टी।
इन्हीं पाँच तत्वों से चेतना है हमें मिलती।
आज के दौर में, ये स्रोत हो चुके हैं प्रदूषित,
इन सब की सबसे बड़ी वजह है प्लास्टिक।
विश्व पर्यावरण दिवस 2018, थीम थी
इन्हें मात देने पर आधारित।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने चुना था मेजबान ,
हमारा देश भारत।

वैसे तो उपयोगी है प्लास्टिक जीवन में।
पर यह घुलता नहीं है पर्यावरण में।
सैकड़ों साल तक रहता है बना अपनी जगह पर।
गड़ा हो मिट्टी में, तो बनाता है उसे बंजर।
पानी बने जहरीला, गर हो उसमें प्लास्टिक।
पेट में जाएँ जलीय जीवों के,
तो बने मौत का कारण।

बीते 50 वर्षों में ...
जितना बढ़ा है प्रयोग प्लास्टिक का,
उतना और किसी चीज का प्रयोग नहीं बढ़ा।
1960 में 50 लाख टन हो रहा था
प्लास्टिक का उत्पादन।
आज कर गया है
300 करोड़ टन का आंकड़ा पार।

कॉस्मेटिक्स में भी उपयोग
हो रहा है माइक्रोप्लास्टिक,
पानी में घुल जाए गर,
तो कर दे इसे प्रदूषित।
जलीय जीवों में भी पाई गई है
इनकी मौजूदगी,
यह पहुँच रहे हैं भोजन श्रृंखला से होकर
पक्षियों और कछुओं में भी।
इसी के मद्देनजर 2017 में भारत में
इसे किया गया था बैन।
रीसाइक्लिंग से बचा और बेकार हो चुका
प्लास्टिक का बड़ा हिस्सा,
हमारे समुद्रों में हो रहा डंप।
2016 में 17 खरब प्लास्टिक के टुकड़े
थे मौजूद समुद्रों में,
ऐसा कहा हमारे वैज्ञानिकों ने।

खाना समझकर या अनजाने में
समुद्री जल जीव खा जाते हैं प्लास्टिक।
बैग, बोतलों के ढक्कन, खिलौने,
सिगरेट लाइटर तक हैं इनमें शामिल।
आवारा गायें, प्लास्टिक थैलियों में फेंके गए
खाद्य पदार्थ के साथ,
जाती है इसे निगल।

693 प्रजातियों के पक्षी और जीव,
इनके मौत का कारण बन रहे हैं,
प्लास्टिक की रस्सियाँ और जाल।
अमेरिका ने खर्च किए हैं,
समुद्र की तलहटी की सफाई में असंख्य डॉलर,
देश हमारा ले नहीं सकता इतना भार।
जलीय जीव गर प्लास्टिक खा,
कर ले उसे हजम,
तो बन जाते हैं खतरा
अन्य जीवों के लिए जान का।

पहुँचते हैं फिर मनुष्य की थाली में भी,
सीफूड है जिन का मुख्य भोजन।

दुनिया के कुछ हिस्सों में
इन अनुपयोगी प्लास्टिक की
बनाई जा रही हैं सड़कें,
ईरान सहित कई देश कर रहे उपयोग,
छोटे टुकड़ों में तोड़ कंक्रीट के रूप में।
मौजूद प्लास्टिक का
एक तिहाई तो होता है रीसाइकिल,
पर रीसाइक्लिंग होनी चाहिए अधिक मात्रा में।
पाइरालाइसिस…. है एक विधि
जो बदलता है प्लास्टिक को ईंधन के रूप में!

लानी होगी जागरूकता,
लोग थैला लेकर जाएँ बाजार में।
प्लास्टिक का कूड़ा संग्रह करने वाली एजेंसी को ही
प्लास्टिक का कचरा दें,
ताकि इन की रीसाइक्लिंग हो सके।
प्लास्टिक को प्रतिबंधित करने के लिए,
करने होंगे कठोर फैसले।
ताकि महानगरों में बनते,
कचरे के पहाड़ों को रोका जा सके।

उपभोक्तावादी संस्कृति में,
चाय, दूध, खाद्य तेल और
दूसरे तरल पदार्थ भी,
हम लाते हैं इन्हीं प्लास्टिकों में।
खाने पीने की कुछ वस्तुएँ,
जो प्लास्टिक के संपर्क में आते ही
करती हैं रासायनिक क्रियाएँ,
हम उन्हें भी लाते हैं इन्हीं में।
रासायनिक क्रियाओं के बाद
वे खाद्य वस्तुएँ बन जाती हैं
हानिकारक सेहत के लिए,
लाती हैं बीमारियाँ अनेकों
हमारे लिए सौगात में।
बचाना है गर भावी पीढ़ी को,
इस प्लास्टिक के पहाड़ से,
तो खोजना होगा विकल्प
कोई ना कोई हमें।

प्लास्टिक के विकल्प के रूप में
बायोप्लास्टिक आया है अभी बाजार में ।
प्राकृतिक रूप से आसानी से
नष्ट होने वाला प्लास्टिक है ये।
पॉली लैक्टिक एसिड पॉलीमर से
किया गया है तैयार इसे।
देखने में बिल्कुल पॉलिथीन का ही रूप है यह।
होता है इनका निर्माण
सब्जियों में मौजूद वसा, तेल,
कॉर्न और मटर में मौजूद स्टार्च से।
सूक्ष्म शैवालों और
केले के छिलकों की मदद से।
हो जाते हैं नष्ट यह आसानी से,
निकलती है कार्बन डाइऑक्साइड की
मात्रा भी कम इन से!
इसलिए होते हैं कम नुक़सानदेह
पर्यावरण के लिए।

प्लास्टिक है जरूरी,
लगभग है मजबूरी।
लाना है बदलाव हमें,
अगर सच्चे मायने में,
तो आदतें बदलनी होंगी
अपनी हमें,
प्लास्टिक पर निर्भरता
करनी होगी कम हमें,
निभानी होगी हमें अपनी ज़िम्मेदारी,
बनकर पर्यावरण के सच्चे प्रहरी।

नीना सिन्हा।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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