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दिल का बजट और तुम्हारी मुस्कान

                
                                                         
                            मुझसे नाराज़ न हुआ करो,
                                                                 
                            
दिल का बजट ही घाटे में चला जाता है।
तुम्हारी खामोशी का हर पल,
जैसे खर्चा बढ़ाता चला जाता है।
जब तुम मुस्कुराते नहीं,
मेरी आँखों की चमक ही बुझ जाती है,
लबों की हँसी रुक जाती है,
साँसों की रफ़्तार भी थम सी जाती है।
दिल की धड़कन भी घबरा जाती है,
जैसे कोई हिसाब अटक जाता है,
तेरे बिना हर एहसास मेरा,
अधूरा सा रह जाता है।
लिवर भी शिकायत करने लगता है,
“इतना टेंशन क्यों भाई?” समझाता है,
किडनी भी बोल उठती है धीरे से,
“खुश रहो, सब बैलेंस हो जाता है।”
फेफड़े भी सांस लेते-लेते पूछें,
“मुस्कान का स्टॉक कब आएगा?”
तेरी हँसी के बिना ये शरीर भी,
जैसे काम अधूरा ही रह जाएगा।
मुस्कान तुम्हारी आमदनी है मेरी,
जिससे हर कमी पूरी हो जाती है,
पर तेरी नाराज़गी की एक झलक,
सारी खुशियाँ उधार हो जाती है।
तुम पास रहो तो सब मुनाफ़ा लगे,
हर दिन त्यौहार सा सज जाता है,
बस यूँ ही हँसते रहो मेरे लिए,
वरना दिल का हिसाब बिगड़ जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 महीने पहले

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