अपनों से अलग एक अजीब सी दुनिया बसा रहे है हम.
ना जाने किस तरफ जा रहे है हम..
खून के रिश्तो मे नहीं रही मोहब्बतें अब.
और बेगानो पर मोहब्बत लुटाए जा रहे है हम..
अब देख कर भी अनदेखा करने लगा है वो.
शायद अपनी अहमियत खोय जा रहे है हम..
बना लिए है सबने अपने अपने कमरे.
अब घर के आँगन मे कहा मिलते है हम..
नाराज़ हो जाते है अब हर एक बात पर हम.
शायद ज़िम्मेदारी से बचने का हुनर जान गए है हम..
दिलो को तंग कर लिया हमने.
और मकानों पर मकान बनाए जा रहे है हम..
ना जाने किस तरफ जा रहे है हम.....
- मेरी निजी कलम से
नवेद इस्लाम
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