मैं घोर आशावादी हूँ
निराशा को कभी
पास नहीं फटकने देता
मेरी उम्मीदों की ढाल से
टकराकर लौट जाती हैं
गर कभी मायूसियां
मेरी ओर आती है
आरजू की गहरी वादियों में
सौंधी पवन सरसराती है
बारिश के पानी में
महकने लगती है मिट्टी
और कच्ची कलियां मुस्कुराती है
आशाएं पुष्पित पल्लवित होकर
मन उपवन में खिलखिलाती है
#बशर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X