हँस-हँस कर जिसने द्वारे पर, रस्में सभी निभाई थीं,
भीतर-भीतर उस पिता ने, कितनी कसकें छुपाई थीं।
"बाबुल रोए तो नहीं हो?"— जब उसने मुड़कर देखा था,
पिता ने अपनी आँखों में, उमड़ता सावन रोका था।
पर आज बंद दरवाज़े में, वह झूठी हिम्मत टूट गई,
हाथों से जैसे जीवन की, कोई अनमोल डोर छूट गई।
सूने आँगन की तुलसी भी, आज उदासी ओढ़े थी,
जैसे उसने भी अपनी, कोई सखी वहाँ पर छोड़ी थी।
मेज़ पर आधी खुली किताब, और चुन्नी उसकी कुर्सी पर,
बाबुल की आँखें ठहर गईं, उस खालीपन की बस्ती पर।
बचपन की यादें बिखरी थीं, उस घर के हर इक कोने में,
और पिता चुपचाप लगा था, इन स्मृतियों को संजोने में।
बिस्तर की सिलवट ठीक की, तकिये को प्यार से सहलाया,
अँधियारे में जाने कैसे, बेटी का अक्स उभर आया।
"ठंड लगेगी, चादर ले लो"— कहकर हाथ बढ़ाया था,
पर कोई उत्तर नहीं मिला, जब खाली पलंग थपथपाया था।
"दवा ले ली ना?"— कमरे में अब, कौन डाँटने आएगा,
"ठंडी चाय मत पिया करो"— यह हक़ कौन जताएगा।
उस खाली कप को थामे पिता, वह मीठी झिड़की ढूँढ रहा,
गीला चश्मा पोंछ-पोंछ कर, अपनी बिटिया ढूँढ रहा।
पहली बार लगा बाबुल को, घर कितना सूना होता है,
बिना सिसकियों के जब कोई, पिता रात भर रोता है।
खिड़की के बाहर नीम से बोला— "कल तू भी पूछेगा शायद,
कहाँ गई वह चिड़िया मेरी, कल तू भी ढूँढेगा शायद।"
जिसकी डाली पर झूला था, बचपन का हर सावन उसका,
आज उसी को ढूँढ रहा है, मौन खड़ा यह आँगन उसका।
पत्तों की सर-सर में जैसे, बेटी की ही आहट थी,
पर कमरे के सन्नाटे में, इक मौन सी छटपटाहट थी।
हवा चली तो ऐसा लगा, गूँज रही किलकारी थी,
पर कमरे के सन्नाटे की, चोट बहुत ही भारी थी।
रात गुज़ार दी उसने यूँ ही, उस सूने कमरे के अंदर,
सिसकियाँ भी मौन थीं उसकी, शांत पड़ा था जैसे समंदर।
टूटी गुड़िया, एक रिबन, वह मुट्ठी में भींचे बैठा था,
जैसे अपने बीते कल को, बाँहों में खींचे बैठा था।
भोर हुई जब माँ ने देखा, पिता वहीं पर ठहरा था,
और आँखों में उस रात का, दर्द बहुत ही गहरा था।
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