कैसे घुटे बन्द कमरों में जीवन
ले के चलता है आशा
बेहतर जिंदगी की
सहता है तापमान के उत्तर चढ़ाव
नापता है देह के घटते वज़न से
सफ़ल होने की संभावना
लेता है शरण दरकती बिल्डिगों में
ताकि खींच सके कुछ और मोहलत
भूख के जबड़ों से
टिक सके परीक्षा के दिन तक
बड़े शहर में
अगर नही जानते तुम
उस युवा के फैसलों के पीछे का अर्थशास्त्र
तो इस देश के नही हो तुम
क़ाबिज़ हो देश पर परजीवी के समान
अगली पीढ़ी की लड़ाई तुम से ही है ।
- नरेन्द
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