कोई बहाने भी आखिर और कितने बनाए
क्यो न वो ख़ुद ही कभी सब समझ जाएँ
बरसती रहीं लगातार बारिश की धाराएँ
क्यों न वो कभी आंगन में खुद चली आएं
फ़लक सारा ही मदिरालाय सा हो गया,
कतरा कतरा बारिश का शराब हो गया
फिर भी उसके इंतज़ार में प्यासे ही रहे
न जाने कितने सावन हमने यूँ ही गवाए
कभी तपती धूप, कभी हल्की-सी बारिश,
कभी सहर तो कभी धुंध नर्म-सी ख़्वाहिश।
कभी खामोश, कभी बेख़ुद-सा यह सफ़र,
उसके बिन तो मौसम सारे फना ही हो जाएँ।
दूर से ही बस मुस्कान देकर चले जाते हैं,
पास आओ तो नज़र फेरे निकल जाते हैं
जज्बात सारे दिल मे सिमटकर रह जाते हैं
जिंदगी सारी गुजरेगी शायद यूं आस ही लगाए
सारी बातें लफ्जों में कहना मुमकिन नहीं होता
बिना कहे वो समझे कुछ बातें तो अच्छा होता
रंगबिरंगी रंगों में डूबी हुई हैं यह दुनिया सारी
मगर उनके बिना जिंदगी में रंग थोड़ी भर आए
ज़िंदगी में सब कुछ विपरीत ही क्यों हो जाता हैं
हँसने को चाहा तो आंखों में पानी भर आता हैं
मदिरा की मस्ती का अरमान दिल में पलता रहा,
और हर जाम आख़िर आँसुओं से ही भर जाए।
-नंदकुमार भागवत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X