भागता ही फिर रहा हूं, मैं कब से इस शहर में
अब तो ये शहर भी थोड़ा सा 'गांव' हो जाए !!
खड़े दिख रहे हैं, भगवान् ही भगवान् यहां पर
अब तो कहीं कोई ज़रा 'इंसान' भी हो जाए !!
सुगबुगाहट सी होने लगी घास के तिनकों में भी
इन घोंसलों में पंछियों के पंख परवाज़ हो जाएं !!
हां, पेचीदा बहुत रहा लैपटॉप तक का ये सफ़र ,
विज्ञान गणित की जिज्ञासाएं किताब हो जाएं !!
सावन है,बारिशें भी हैं,आ जाए वो बचपन ज़रा
कि हमारी कापियों के पन्ने अब नाव हो जाएं !!
कब तक मैं घुटता रहूंगा यूं 'अपने ही सितम' में ,
हम में से ही कृष्ण, तो कोई श्री राम हो जाए !!
सुनो
जिए जा रहा था अब तलक अपने ही लिए मैं ,
बस, वो जो मांगे दुआ कोई, स्वीकार हो जाए !!
-नमिता गुप्ता "मनसी"
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