आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विज्ञान गणित की जिज्ञासाएं किताब हो जाएं !!

                
                                                         
                            भागता ही फिर रहा हूं, मैं कब से इस शहर में
                                                                 
                            
अब तो ये शहर भी थोड़ा सा 'गांव' हो जाए !!

खड़े दिख रहे हैं, भगवान् ही भगवान् यहां पर
अब तो कहीं कोई ज़रा 'इंसान' भी हो जाए !!

सुगबुगाहट सी होने लगी घास के तिनकों में भी
इन घोंसलों में पंछियों के पंख परवाज़ हो जाएं !!

हां, पेचीदा बहुत रहा लैपटॉप तक का ये सफ़र ,
विज्ञान गणित की जिज्ञासाएं किताब हो जाएं !!

सावन है,बारिशें भी हैं,आ जाए वो बचपन ज़रा
कि हमारी कापियों के पन्ने अब नाव हो जाएं !!

कब तक मैं घुटता रहूंगा यूं 'अपने ही सितम' में ,
हम में से ही कृष्ण, तो कोई श्री राम हो जाए !!

सुनो
जिए जा रहा था अब तलक अपने ही लिए मैं ,
बस, वो जो मांगे दुआ कोई, स्वीकार हो जाए !!
-नमिता गुप्ता "मनसी"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
48 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर