जटा हमारे ॠषि-मुनी की पहचान है
अक्सर ॠषि-मुनी तप में लीन हो जाते हैं
योग और ध्यान ईश्वर से संपर्क करतें हैं
कई ॠषि-मुनि ईश्वर से
साक्षात्कार में सफल भी होते हैं
और वरदान भी ईश्वर से प्राप्त होते हैं
ऐसा हमारे ग्रंथ और पुराणों उल्लेख है
वर्षों-वर्षों तक तप में लीन होते हैं
सिर के बाल बिना तेल के बाल जटा बन जाता है
अब भी आपको एकांत पर्वत
और जंगलों में तपस्या करते दिख जाते हैं
पर इस कलियुग में ईश्वर से
मिलना असंभव प्रतीत होता है
पर उनकों मन की शांति जरुर मिलती होगी
एकांत में जंगल-पहाडों में रहना ही
कठोर तपस्या ही है
जटा-जूट होना एक शरीर का
स्वाभाविक प्रक्रिया ही है
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