आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेजुबान

                
                                                         
                            पता नहीं क्यों मैं पत्नि के सामने बेजुबान हो जाता हूं
                                                                 
                            
बड़े कवि सम्मेलन में भी बेधड़क कविता बोल जाता हूं
दोस्तों के साथ आत्मविश्वास के साथ बहस कर जाता हूं
संगोष्ठी प्रतियोगिता में अक्सर प्रथम पुरस्कार पा जाता हूं
आज सुबह की बात ही ले लीजिए रविवार का दिन था सुबह सात जब मैं गहरी नींद में था, पत्नि ने उठा दिया था
पत्नि बोली कि उठो पतिदेव आज बहुत सारे काम हैं
मैने बोला कि एक घंटा सोने दो उठ कर सब काम कर दूंगा
नहीं नहीं अभी उठना पड़ेगा, वरना बकरी बना दूगी
फिर दिन भर में- में-में करते रहना
मैं तत्काल उठकर बाॅथरुम तरफ भाग कर गया
जब मैं वापस आया, पत्नि ने गरम चाय किया स्वागत
दिल खुश कर दिए पत्नि ने बिस्कुट और चाय से स्वागत
मैं कितना गौरवान्वित हूं कि पत्नि मेरी बहुत अच्छी है
ऊपर से नारियल जैसा सख्त अंदर से ऊपर से गरम
दोनों बच्चों को नाजो से पाल रही है, क्यों बनूं बेजुबान
पत्नि बहुत प्यारी ,ममतामयी सुघ्घड़ है वही तो मेरी शान
हर समय, हर पल, बारहों महिने बने रहूं बेजुबान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर