सोचता हूँ कभी-कभी
आने वाला कल
बिता हुआ कल
सकून वाला पल
आसपास की हलचल
असमंजस में बीता अभी- अभी।
सोचता हूँ कभी-कभी
कहाँ गलत, कहाँ सही
कौन सही,कौन गलत
मिलता नहीं जवाब
असमंजस में बीता अभी अभी।
सोचता हूँ कभी कभी
समाज कहाँ, देश कहाँ
नैतिकता कहाँ,ईमानदारी कहाँ
स्वयं की हलचल में बीता अभी अभी।
सोचता हूँ कभी कभी
धर्म कहाँ, कर्म कहाँ
अपनापन की चाहत में
उम्मीद की किरण आती कभी कभी।
सोचता हूँ कभी कभी
समाज सेवक बनूँ
नेता बनूँ
विकास की धारा में
हम भी शामिल हो कहीं कहीं।
सोचता हूँ कभी कभी
तप करूँ,जप करूँ
आस्था की गंगा में
डुबकी लगाऊँ कभी कभी।
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