भीगने के लिये बरसात जरूरी नहीं
पेड़ से टपकते ओस की बून्दें काफी हैं।
नयनों के सौंदर्य के बखान के लिए शब्द कहाॅं चाहिए!
प्रेम का उदगार हो या नफरत , दोनों जतलाना बखूबी आता है।
उम्र की क्या कहें, अपनी ही धुन में बढ़ता जाता है
कमबख़्त सपनों का क्या करें, अपनी ही धुन में अटक जाते हैं।
मकानों को सजाने में इतने मशगूल हो गये
डैना होते हुए भी उड़ने की कला ही भूल गए।
ऊपरवाला सब कुछ देकर भी चुप है
हम चुटकी भर भी बिना दिए शोर मचाते रहे।
-नाग मणि
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