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कोरोना का कहर

                
                                                         
                            कविता - कोरोना का कहर
                                                                 
                            
अमीरों ने लाई बीमारी है
गरीबों पर कहर बन कर छाई है
हाहाकार मचा है चारों तरफ
न जाने कैसी घड़ी आई है
न दिन में सुकून है न रातों में करार
हर पल अनहोनी की आशंका बन आई है
पैर पसार कर कोरोना
देश में दुर्गति लाई है
मानवता के लिए अभिशाप बन
चारो दिशा में जहर फैलाई है
जिंदगी मौत से भी बदर बन
जिल्लत की रोटी खाई है
खाली पेट न संघर्ष होता
कोरोना ने ऐसी हालत बनाई है
बच्चें , बूढ़े और जवान सब
कोरोना से संक्रमित हो आई है
भय के छाये में जीने को
मजबूर हो गए है जग वाले
न जाने कौन घड़ी में
कोरोना मुझ पर भी असर दिखा जानी है
चार पल की जिंदगी भी
खौफ के साये में
इक पल में ही खत्म हो जानी है
कोरोना के खौफ ने
न जाने जिंदगी कहाँ ले आई है ।

- मुस्कान चाँदनी, बिहारशरीफ, नालंदा

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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