कर्ज़
दूर से जो चमकते हो तुम
मेरे साथ रहना ना तुम्हें राज़ी था
बिछड़ने की सजा यूँ मिली मुझे
जैसे मेरा कोई कर्ज़ देना बाकी था
खुशियाँ ढूंढ रहे थे हम
पर खुदा कहाँ राजी था,
दर्द आए इसे जहाँ में
जैसे मेरा कोई कर्ज़ देना बाकी था
शिकायत भी ना कर सके हम
क्योंकि खुदा ही काज़ी था
अकेला छोङ गए तुम मुझे यहाँ,
जैसे मेरा कोई कर्ज देना बाकी था
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