भूत होते हैं—क्यों नहीं होते?
जो आँखों से दिखते नहीं,
पर भीतर कहीं पलते हैं।
किसी की कामयाबी देखकर
जब अपने ही दिल में दर्द उठता है,
दूसरे की खुशी में खुश होने से
कोई हमें रोकता है—
वो ईर्ष्या का भूत ही तो है।
बिना मेहनत के ऊँचाई पाने की चाह,
मेहनत से हमें दूर भगाती है,
थोड़ा-सा पाने की लालच
बड़े सपनों की राह रोक जाती है—
वो लालच का भूत ही तो है।
और जब कुछ पा लेते हैं हम,
तो भीतर एक आवाज़ उठती है—
“मुझसे ऊपर कौन?”
अपने ही अस्तित्व को
सबसे ऊँचा समझने लगते हैं—
वो अहंकार का भूत ही तो है।
ये भूत न डरावने दिखते हैं,
न रातों में दिखाई देते हैं,
ये तो हमारे भीतर रहते हैं—
हमारे सोच में,
हमारे व्यवहार में,
हमारे ही मन के अँधेरे कोनों में।
भूत होते हैं—क्यों नहीं होते?
बस फर्क इतना है,
ये हमें डराते नहीं…
हमें हमसे ही हराते हैं।
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