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काश लौट पाता I

                
                                                         
                            काश लौट पाता उन दिनों में,
                                                                 
                            
जहाँ शामें थोड़ी लंबी थीं,
जहाँ मुलाक़ातें छोटी थीं,
मगर खुशियाँ बहुत गहरी थीं।

वही रास्ते, वही गलियाँ,
वही मौसम, वही आसमान,
बस एक कमी आज भी महसूस होती है—
कहाँ खो गया वह पुराना इंसान?

कुछ बातें आज भी याद हैं,
कुछ वादे अब भी अनकहे हैं,
समय ने भले दूर कर दिया,
मगर वे पल अब भी मेरे अपने हैं।

कभी-कभी पुरानी गलियों में
अतीत यूँ सामने आ जाता है,
जैसे कोई बंद किताब अचानक
अपना सबसे सुंदर पन्ना खोल जाती है।
-मुनीर शमी
 
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35 मिनट पहले

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