मोहब्बत करती है पर दोस्त बुलाती है...
ये कैसा रिस्ता है जो डर डर के निभाती है...
नजरो से चूमती है लब्जो से ठुकराती है...
ख़ुद भी उलझी है और मुझे भी उलझाती है...
न इस पार आती है न उस पार जाती है...
हक़ आशिक़ो का और हद दोस्ती की बताती है...
किसी और का ज़िक्र करूँ तो जल सी जाती है...
मेरे हर हिस्से में अपना हिस्सा चाहती है...
अक्सर पूछती है मुझसे तुम कौन हो मेरे...
क़सम खाये तो मेरी क़सम खाती है...
मोहब्बत करती है पर मुझे दोस्त बुलाती है...
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