आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मोहब्बत करती है पर मुझे दोस्त बुलाती है..

                
                                                         
                            मोहब्बत करती है पर दोस्त बुलाती है...
                                                                 
                            
ये कैसा रिस्ता है जो डर डर के निभाती है...
नजरो से चूमती है लब्जो से ठुकराती है...
ख़ुद भी उलझी है और मुझे भी उलझाती है...
न इस पार आती है न उस पार जाती है...
हक़ आशिक़ो का और हद दोस्ती की बताती है...
किसी और का ज़िक्र करूँ तो जल सी जाती है...
मेरे हर हिस्से में अपना हिस्सा चाहती है...
अक्सर पूछती है मुझसे तुम कौन हो मेरे...
क़सम खाये तो मेरी क़सम खाती है...
मोहब्बत करती है पर मुझे दोस्त बुलाती है...
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर