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तुम बढ़ गए आगे मगर॥

                
                                                         
                            जिसे रूह माना,
                                                                 
                            
वो बस एक छलावा था,
वक्त की आड़ में छिपा एक बुलावा था।
हम झुर्रियों तक साथ निभाने चले थे,
पर उनका हर एक वादा ही दिखावा था॥
चेहरे के बदलते रंग को,
हम समझ न पाए,
अहसास के पीछे छिपे,
कपट को पढ़ न पाए।
जो समय से परे होने का दम भरते थे,
वो चंद लम्हों में ही अपना साया चुराए॥
सच्ची मोहब्बत को खेल बना दिया,
विश्वास की पावन रीत को भुला दिया तुमने।
हम तो जिस्म से आगे आत्मा ढूंढ रहे थे,
पर इस पाक नाते को भी,
दगा दिया तुमने॥
अब न वक्त का शिकवा है,
न ढलती उम्र का डर,
धोखे ने उजाड़ दिया,
चाहत का वो हसीं घर।
जो रिश्ता रूहानी था,
वो तमाशा बन गया,
खंजर वफ़ा का घोंप कर,
तुम बढ़ गए आगे मगर॥
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एक घंटा पहले

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