उन से मिलो तो जान के दिल में सहने की ताक़त है कि नहीं
ज़ख़्म को छेड़ के पूछते हैं वो दर्द में राहत है कि नहीं
वो जो हमारे बन कर सबकुछ बैठ तुम्हारे पास गए
उनकी बनावट बतलाएं पर सुनने की हिम्मत है कि नहीं
पांव धरा कब याद नहीं कुछ पांव उठा क्यों ख़बर नहीं
हैं किस राह पे ये भी न मालूम हाय क़यामत है कि नहीं
भूल गए सब कहना सुनना याद रहा तो बस इतना
पूछती थी वो होठ दबा कर मुझसे मोहब्बत है कि नहीं
बाद गुज़रने के लगता है वक़्त से तेज़ नहीं कुछ भी
बात ये हिज्र की लम्बी तन्हा रात की बाबत है कि नहीं
मयख़ाना इक रात खुलेगा पायी ख़बर उड़ती उड़ती
राह पे है घर देखता हूँ पर राह पे हालत है कि नहीं
तेरी गली में पांव पड़ा जो नज़र न तो उठ पायेगी
झांक गिरेबां में देखूंगा थोड़ी शराफ़त है कि नहीं
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X