शाबाश! शाबाश!
क्या तुमने कभी सोचा है,
तुम अपने लिए क्या करते हो?
दूसरों के लिए जीते-जीते,
क्यों खुद से दूर निकलते हो?
क्या कोई तुम्हें पूछता नहीं?
क्या कोई तुम्हें चाहता नहीं?
कभी ठहरकर देखो तो सही,
कोई तुम्हें समझता भी है कहीं।
तुम कहते हो—सब ठीक है,
पर आँखें कुछ और कहती हैं।
हँसते हो दुनिया के सामने,
पर खामोशियाँ बहुत कुछ सहती हैं।
शाबाश! शाबाश! कहते हो,
पर खुद को कब शाबाश दिया?
दूसरों की खुशियों में खुश होकर,
क्या खुद को कभी प्यार किया?
बताओ, बताओ—जवाब दो,
तुमने खुद को कब समझा है?
भीड़ में चलते-चलते आखिर,
अपने मन को कब पढ़ा है?
चलो, साथ-साथ चलते हैं,
कुछ दूर नहीं—बहुत दूर तक।
तुम मेरा हाथ थामे रखना,
मैं रहूँगा तुम्हारे साथ हर पल तक।
न कोई दिखावा, न कोई छल,
बस मन से मन का साथ रहे।
जब शब्द सभी खामोश हो जाएँ,
तब भी अपना विश्वास रहे।
शाम ढले जब लौटो घर,
मन में कोई मलाल न हो।
जो बीत गया, उसे जाने दो,
आने वाला कल बेहाल न हो।
तुम बस चलते रहना आगे,
रास्ते खुद बनते जाएँगे।
आज जो तुम्हें कम समझते हैं,
कल वही तुम्हें शाबाश! कह जाएँगे।
— संतोष कुमावत
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