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मुक्तक

                
                                                         
                            आग जली है जब-जब चाहे, चूल्हे या शमशान की
                                                                 
                            
तब-तब उभरी है मंशाएं, लोभी सियासतदां की
कैसे सिके हमारी रोटी, बस उनको है फिक्र यही
जले लकड़ियां चूल्हे में या लाश जले इंसान की


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6 वर्ष पहले

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