आग जली है जब-जब चाहे, चूल्हे या शमशान की
तब-तब उभरी है मंशाएं, लोभी सियासतदां की
कैसे सिके हमारी रोटी, बस उनको है फिक्र यही
जले लकड़ियां चूल्हे में या लाश जले इंसान की
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