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जिंदगी उल्फतों में मेरी कट गई

                
                                                         
                            जिंदगी उल्फतों में मेरी कट गई
                                                                 
                            
जिसको चाहा था मुझको मिला ही नहीं

मेरी किस्मत मुझे तो दगा दे गई
सोचता था मैं क्या वह सजा दे गई

नहीं कोई शिकायत है ऐ जिंदगी
रहे खुश तू हमेशा मेरी जिंदगी

मेरा तुझ पर भरम था बेरहम हो गई
जिंदगी मुझसे क्यों बे करम हो गई

तेरा इतना कहर दिल पर अच्छा नहीं
मेरा पागल जिगर एक खिलौना नही

जा तू जैसे रहे मुझको परवाह नहीं
ये मेरी ज़िन्दगी कोई अफवाह नही

ना मिला दिल्लगी का मुझे कुछ सिला
मेरे अल्लाह मुझे अपनी पनाहो मे बुला

मैं उसे माफ़ करके चला जाऊंगा
चाह कर भी नहीं लौट अब पाऊंगा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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