आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

थोड़ा थक सा जाता हूँ

                
                                                         
                            थोड़ा थक सा जाता हूँ अब मैं
                                                                 
                            
इसलिए दूर तक निकलना छोड़ दिया है
पर ऐसा भी नहीं है कि अब
मैंने अब अपनो से मिलना छोड़ दिया है
फासलें अक्सर रिश्तों के बागीचें मे
अजीब सी दूरियाँ बढ़ा जाते हैं
पर ऐसा भी नहीं है कि अब मैंने अपनो से
मिलना जुलना छोड़ दिया है
हाँ जरा सा अकेला महसूस करने लगा हूँ खुद को
अपनो लोगो की भीड़ में
पर ऐसा भी नहीं है कि अब मैंने उन अपनो से
अपनेपन को जताना छोड़ दिया है
बड़ी कमी सी महसूस होती है अहसासों मे
पर ऐसा भी नहीं है उनके दिल का हाल जानना छोड़ दिया है
पल पल बदलते रिश्तो से अब डर जाने क्यूँ लगता है
अपने जी का जन्जाल बनाना छोड़ दिया है

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर