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तेरा था मैं पर तेरा हुआ नहीं हूँ

                
                                                         
                            तेरा था मैं पर तेरा हुआ नहीं हूँ
                                                                 
                            
इंसान हूँ मैं कोई खुदा नहीं हूँ

भटकता रहा दर-बदर ज़िन्दगी भर
खूब तकलीफ झेली पर रोया नहीं हूँ

मोहब्बत की तासीर होती नरम है
मैं भूखा हूँ इज्ज़त का मरा नहीं हूँ

बस आज रात भर नींद आयी नहीं है
लग रहा है कि मुद्दत से सोया नहीं हूँ

कोई प्यार की कब है कीमत लगाता
मैं पागल हूँ पर कोई जुआ नहीं हूँ

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले

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